अरावली बचनी ही चाहिए - किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'
अरावली बचनी ही चाहिए
(सामाजिक कार्यकर्त्ता एवं बदलाओकारी विचारक)
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ब्लॉग - कुसराज की आबाज
आजकल #अरावलीबचाओ #SaveAravalli सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है क्योंकि अंतराष्ट्रीय पर्वत दिवस पर 11 दिसम्बर 2025 को राजस्थान से शुरू हुआ अरावली बचाओ / सेव अरावली अभियान अब भारत में जोरों से चल रहा है। इस अभियान से हम सबको जुड़ना चाहिए क्योंकि बात सिर्फ अरावली क्षेत्र के संरक्षण की नहीं है, बल्कि प्रकृति की रक्षा की है। प्रकृति है तो हम हैं। यदि प्रकृति नहीं बचेगी तो हम भी नहीं बचेगें।
अरावली बचाओ अभियान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली की पहाड़ियों की नई परिभाषा को मान्यता देने के विरोध में चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने हालिया सुनवाई में भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित अरावली की वैज्ञानिक परिभाषा को स्वीकार किया है। जिसमें कहा गया है - “जिस भूभाग की ऊँचाई आसपास के सामान्य धरातल से कम से कम 100 मीटर अधिक होगी, उसे अरावली पहाड़ी माना जाएगा। वहीं 500 मीटर के दायरे में स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला की श्रेणी में रखा जाएगा।”
सुनवाई में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा है - “ढाई अरब वर्ष पुरानी विश्व की प्राचीनतम पर्वतश्रृंखलाओं में से एक अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से नीची की पहाड़ियों को अपने-आप जंगल नहीं माना जाएगा। 100 मीटर तक खनन की अनुमति होगी अर्थात अरावली माँ के गर्भ पर वार करना अपराध नहीं माना जाएगा।”
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले पर विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली सिर्फ ऊँचाई का विषय नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र है। सरकारी आँकड़ों और तकनीकी अध्ययनों के अनुसार, राजस्थान में मौजूद अरावली की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ 100 मीटर की ऊँचाई की शर्त पूरी नहीं करतीं। इसका मतलब यह हुआ कि राज्य की केवल 8 से 10 प्रतिशत पहाड़ियाँ ही कानूनी रूप से अरावली मानी जाएँगीं, जबकि शेष लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियाँ कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएँगीं और अवैध खनन से अरावली का अस्तित्त्व संकट में पड़ जाएगा।
अरावली पर्वतमाला विश्व की प्राचीनतम पर्वतश्रृंखलाओं में से एक है, जिसकी आयु लगभग ढाई अरब वर्ष आँकी गई है। अरावली उत्तर-पश्चिम भारत में पारिस्थितिक रीढ़ के रूप में काम करती है। इस पर्वतमाला का विस्तार दिल्ली से गुजरात तक है। इसकी कुल लम्बाई 692 किमी है, जो दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात से होकर गुजरती है। राजस्थान में अरावली का 550 किमी में विस्तार है यानी 80% अरावली राजस्थान में ही है। अरावली पर्वतमाला की सबसे ऊँची चोटी गुरूशिखर राजस्थान के सिरोही जिले के माउण्ट आबू में स्थित है, जिसकी ऊँचाई लगभग 1722 मीटर है।
पर्यावरणीय दृष्टि से अरावली की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है। अरावली थार रेगिस्तान को पूर्व दिशा में फैलने से रोकती है और उपजाऊ इंडो-गंगा के मैदानों की रक्षा करती है। इसके साथ ही यह जलवायु संतुलन, भूजल संरक्षण और जैव विविधता संरक्षण में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाती है। बनास, साबरमती और लूनी जैसी नदियाँ अरावली से निकलती है, जो जीवनरेखा बनकर किसानों की अप्रत्याशित सहायता करती हैं।
अरावली क्षेत्र खनिज संसाधनों से अत्यंत समृद्ध है। इसमें चूना पत्थर, संगमरमर, बलुआ पत्थर, ताँबा, जस्ता और टंगस्टन जैसे खनिज पाए जाते हैं। इसी कारण से यह क्षेत्र दीर्घकाल से खनन गतिविधियों का केन्द्र रहा है। पिछले दशकों में अत्यधिक और अनियंत्रित खनन के कारण अरावली को भयंकर क्षति पहुँची है। जंगलों का नाश हुआ, भूजल स्तर गिरा और विशेषकर दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता पर इसका हानिकारक प्रभाव पड़ा।
पर्यावरणविदों का मानना है कि अरावली बचाने की लड़ाई केवल न्यायालय या सरकार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज की साझा जिम्मेदारी है। अरावली का क्षति स्थायी हो सकती है, क्योंकि एक बार पहाड़ कटे और जलधाराएँ टूटीं तो उन्हें वापस लाने में सदियाँ लग जाती हैं। इसलिए आज जनजागरण और सवाल उठाना भविष्य को सुरक्षित करने की जरूरत बन गया है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र - दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में स्वच्छ हवा, स्वच्छ जल, स्वच्छ वातावरण की उपलब्धता, सतत किसानी और जैव-विविधता की रक्षा के लिए अरावली बचनी ही चाहिए। यदि अरावली नहीं बची तो मानव जीवन संकट में पड़ जाएगा। ऑक्सीजन, पानी और भोजन के अभाव में मृत्यु का तांडव होगा भारत में। सर्वोच्च न्यायालय की अरावली संबंधी नई परिभाषा पूँजीवाद की समर्थक, पर्यावरण विरोधी, किसान विरोधी और आदिवासी विरोधी मानसिकता की परिचायक है। विनाशकारी विकास से विकसित भारत नहीं बनेगा। विकसित भारत बनेगा सतत विकास से। जून 2025 में भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए अरावली ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट लॉन्च किया था। यह परियोजना अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल से प्रेरित है। जिसका उद्देश्य गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के 29 जिलों में पाँच किलोमीटर चौड़ी हरित पट्टी विकसित करना है। जिसका लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है।
शोधार्थी शुभि यादव कहती हैं - “विश्व की प्राचीनतम पर्वतश्रृंखलाओं में शुमार अरावली पर्वतश्रेणी आज संकटग्रस्त है। इतिहास गवाह है कि जब जब प्रकृति से खिलवाड़ हुआ है उसका परिणाम अत्यंत भयानक और गंभीर हुआ है। इस जीवन का तुम समझो मोल, प्रकृति है बहुत अनमोल। सतत विकास लक्ष्य भी हमें यही सिखाता, भावी पीढ़ियों के लिए भी कुछ बचाया जाता।”
युवा लेखिका आरती कुशवाहा कहती हैं - “अरावली केवल पहाड़ों की एक श्रृंखला नहीं है, यह उत्तर भारत की जीवनरेखा है। हाल ही में अरावली क्षेत्र में प्रस्तावित परियोजनाएँ विकास के नाम पर उस प्रकृति को निगलने को तैयार हैं, जिसने सदियों से जल, जंगल और जीवन को बचाए रखा है। सेव अरावली एक नारा नहीं, चेतावनी है। यह समय है कि हम सवाल करें। क्या विकास का अर्थ प्रकृति का अंत है? सरकार, कंपनियाँ और समाज सबको मिलकर यह समझना होगा कि बिना अरावली के कोई भविष्य सुरक्षित नहीं। आज अगर हमने आवाज नहीं उठाई, तो कल हमारे पास पछतावे के सिवाय कुछ नहीं बचेगा। अरावली बचेगी, तभी जीवन बचेगा।”
हम भारत सरकार से विनती करते हैं कि वो अरावली के सत प्रतिशत संरक्षण हेतु तत्काल नया कानून बनाए और सर्वोच्च न्यायालय से यह विनती करते है कि वो अरावली की नई परिभाषा को तत्काल रद्द करे। यदि अरावली पर भारत सरकार और सर्वोच्च न्यायालय का यही विनाशकारी रवैया रहा तो अरावली नहीं बचेगी। और यदि अरावली नहीं बचेगी तो पर्यावरण नहीं बचेगा। और यदि पर्यावरण नहीं बचेगा तो फिर किसान नहीं बचेगें। इसलिए हम कह रहे हैं - अरावली बचाओ - पर्यावरण बचाओ - किसान बचाओ।






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