क्रांति और कलम के अमर सेनानी हैं क्रांतिकारी प्रोफेसर डॉ. भगवानदास माहौर - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
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क्रांति और कलम के अमर सेनानी हैं क्रांतिकारी प्रोफेसर डॉ. भगवानदास माहौर - डॉ. शिवजी श्रीवास्तव
झाँसी : 27 फरवरी 2026 को बुन्देलखण्ड कॉलेज, झाँसी के हिन्दी विभाग द्वारा हिन्दी विभाग के संस्थापक आचार्य, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के गुरू, क्रांतिवीर डॉ. भगवानदास माहौर की 116वीं जयंती पर डॉ. भगवानदास माहौर व्याख्यानमाला का आयोजन स्वामी विवेकानंद सभाकक्ष, बुन्देलखण्ड कॉलेज परिसर में किया गया। व्याख्यानमाला का शुभारंभ बीकेडी चौराहा पर स्थित क्रांतिवीर डॉ. भगवानदास माहौर की भव्य प्रतिमा पर अतिथियों द्वारा माल्यार्पण करके किया गया। इस अवसर प्रो. (डॉ.) शिवजी श्रीवास्तव जी की पुस्तक - माहौर जी की प्रामाणिक जीवनी 'चंद्रशेखर आजाद के विश्वस्त सहयोगी क्रांतिकारी डॉ. भगवानदास माहौर' (राष्ट्रीय जीवनचरित) बुन्देलखण्ड को लोकार्पित की गई। बुन्देलखण्ड कॉलेज के यशस्वी प्राचार्य प्रो. (डॉ.) एस. के. राय जी ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा - "क्रांतिकारी प्रोफेसर डॉ. भगवानदास माहौर बुन्देलखण्ड कॉलेज की अमूल्य धरोहर हैं। माहौर जी के स्वाधीनता संग्राम, साहित्य और शिक्षा में योगदान को अब हम लोग इस व्याख्यानमाला से प्रतिवर्ष याद करते रहेंगे।" मुख्य अतिथि डॉ. भगवानदास माहौर के शिष्य और जीवनीकार, सुप्रसिद्ध साहित्यकार, चित्रगुप्त महाविद्यालय, मैनपुरी के पूर्व प्राचार्य एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) शिवजी श्रीवास्तव जी ने राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से सन 2025 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'चंद्रशेखर आजाद के विश्वस्त सहयोगी क्रांतिकारी डॉ. भगवानदास माहौर' पर चर्चा करते हुए कहा - "क्रांतिकारी प्रोफेसर डॉ. भगवानदास माहौर का बुन्देलखण्ड कॉलेज में मैं छात्र रहा हूँ। वे क्रांति और कलम के अमर सेनानी हैं। डॉ. भगवानदास माहौर आजादी की लड़ाई के एक ऐसे जुझारू क्रांतिकारी थे, जिनका इतिहास में सम्यक मूल्यांकन नहीं है। वे चंद्रशेखर आजाद के अनन्य साथी और सरकार भगतसिंह के विश्वस्त सैनिक थे। झाँसी से आजादी की अलख जगाने में माहौर जी ने अमूल्य योगदान दिया। उनकी जीवनी लिखकर मैं गुरूऋण से उऋण होने का प्रयास किया हूँ। यहाँ क्रांतिकारी डॉ. भगवानदास माहौर जी की परम्परा का हमारा शिष्य है क्रांतिकारी लेखक किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'। कुशराज हमसे जुड़े हैं और कलम से क्रांति कर रहे हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी माहौर जी का भारतीय स्वाधीनता संग्राम, शिक्षा, साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता में अमूल्य योगदान है। इस व्याख्यानमाला से हम सभी माहौर जी के जीवन-दर्शन को जानते रहेंगे और अपनी विरासत पर गर्व करते रहेंगे।" वर्चुअल रूप से जुड़ीं विशिष्ट अतिथि सुप्रसिद्ध लेखिका और माहौर जी की शिष्या मैत्रेयी पुष्पा जी ने क्रांतिकारी प्रोफेसर डॉ. भगवानदास माहौर जी को एक आदर्श शिक्षक के रूप में याद किया और अपनी लेखकीय सफलता का श्रेय माहौर जी को दिया। विशिष्ट अतिथि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के हिन्दी विभाग के आचार्य प्रो. मुन्ना तिवारी जी ने माहौर जी की क्रान्तिकारी कार्याें में भागीदारी को बुन्देलखण्ड की उपलब्धि बताते हुए कहा कि अंग्रेजों को 'फिरंगी' संबोधन इसी झाँसी-बुन्देलखण्ड की क्रांतिभूमि से मिला था। फिरंगी का मतलब है जो अपना नहीं है, बाहरी है और जिसको हम स्वीकार नहीं कर सकते। अंग्रेजों और अंग्रेजी सत्ता को बुन्देलखण्ड ने स्वीकार नहीं किया। बुन्देलखण्ड ने अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति की। विशिष्ट अतिथि बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी के हिन्दी विभाग की सहायक आचार्या डॉ. अचला पाण्डेय जी ने माहौर जी के साहित्यिक योगदान पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि माहौर जी की पुस्तक 'यश की धरोहर' कालजयी कृति है, जिससे हम झाँसी-बुन्देलखण्ड के क्रान्तिकारियों को भलीभाँति जान सकते हैं। बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी को कुलगीत भी माहौर जी ने दिया है। बुन्देलखण्ड कॉलेज के संस्कृत विभाग की आचार्या प्रो. ज्योति वर्मा जी ने माहौर को याद करते हुए कहा कि मेरी दादी बचपन में हमें माहौर जी के क्रांतिकारी जीवन के किस्से सुनाया करती थीं। माहौर जी बाँदा में मेरे घर रुकते थे, जिसका उल्लेख मैंने अपनी किताब में किया है। बुन्देलखण्ड कॉलेज के हिन्दी विभाग के पुरातन छात्र, युवा लेखक किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज' जी ने कहा - "सन 1947 के भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी, कलम और तलवार के सशक्त हस्ताक्षर, बुन्देलखण्ड और बुंदेली भाषा के प्रवक्ता, बुन्देलखण्ड कॉलेज झाँसी के हिन्दी विभाग के संस्थापक आचार्य, महान शिक्षाविद, सुप्रसिद्ध लेखक, संपादक, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद के गुरू क्रांतिवीर डॉ. भगवानदास माहौर जी से हम सबको क्रांति करने की प्रेरणा लेकर मातृभूमि की रक्षा और अन्याय के खिलाफ क्रांति करते रहना चाहिए।" डॉ. श्याम मोहन पटेल जी ने स्वागत वक्तव्य दिया और हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. नवेन्द्र कुमार सिंह जी ने आभार प्रकट किया। डॉ. शिवप्रकाश त्रिपाठी जी ने संचालन किया। इस अवसर पर प्रो. कुसुम गुप्ता, प्रो. नूतन अग्रवाल, प्रो. मंजरी दमेले, प्रो. एल.सी. साहू, प्रो. नीलम सिंह, डॉ. आर.बी. मौर्या, डॉ. पुनीत श्रीवास्तव, डॉ. सुधीर कुमार, डॉ. विवेक कुमार सिंह, डॉ. राकेश कुमार यादव, डॉ. कमलेश सिंह, डॉ. उमेश चन्द्र यादव, डॉ. रामानन्द जायसवाल, डॉ. रावेन्द्र कुमार सिंह, दीपक नामदेव, शिवम हरी, रामरती यादव, अनिकेत प्रजापति समेत प्राध्यापकगण, शोधार्थी और छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
रिपोर्ट :
© किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'
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